top of page

Poetry and Prose

Public·1 member

Anuraj

Newbie

Starter

दरवाजा बंद हुआ तो क्या हुआ....?

"दरवाज़ा बंद हुआ तो क्या हुआ,

रास्ते अब भी खुलते हैं।

जिसने भी वो दरवाज़ा बंद किया,

उसे क्या खबर हम किस मिट्टी के बने हैं।

ree

हम वो हैं जो अंधेरों में भी रोशनी ढूंढ लेते हैं,

हर ठोकर को सीढ़ी बना लेते हैं।

रोक सका है कौन किसी को, जो खुद से वादा कर ले,

क्योंकि जब एक दरवाज़ा बंद होता है,

तो दूसरा दरवाज़ा किस्मत खुद खोल देती है।

ree

ए सह्याद्री का पहाड़,

तेरी मिट्टी मुझे बुलंदी देती है,

यहीं जन्मा हूँ, यहीं पला हूँ,

तेरी हर चोटी मेरी हिम्मत की मिसाल बन गई है।

ree

जैसे तूने हजारों तूफ़ान झेले,

फिर भी अडिग खड़ा है,

वैसे ही मेरे हौसले भी हर दर्द में मुस्कुराते हैं।

ना हार मानी है, ना झुका हूँ,

मैं भी सह्याद्री की छाती से निकला हूँ।

ree

जो भी राह में रोड़े डालेगा,

मैं उसे रास्ता बना लूंगा,

क्योंकि मैं सिर्फ मंज़िल का तलबगार नहीं,

मैं वो मुसाफिर हूँ,

जो रास्तों को भी नया नाम देता है।"

7 Views
bottom of page